विश्व के सभी मनुष्य दुःख को दूर कर सुख को प्राप्त करना चाहते है, और दुःख का कारण अज्ञान है, सभी ज्ञान का मुख्य स्त्रोत्र वेद है.
महृषि मनु ने "सर्व ज्ञानमयो हिस:" कह कर वेद को ही समस्त ज्ञान का मूल माना है, अन्यत्र भी "वेदोsखिलो धर्म मूलम" मनु स्मृति २-६ मैं वेद को धर्म का मूल उलेखित किया है, "धर्म जिज्ञासामाना: प्रमाण परम श्रुति: " अथार्थ जो धर्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहते है उनके लिए परम प्रमाण वेद है. Read More...

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प्रभुकृपा से यह संसार गतिशील है। सब प्राणी गतिशील हैं, उनके लिये कर्म करते रहना आवश्यक है। कर्म से ही यह संसार-जीवन चल पाता है। कर्म से जीवन में सुख व सुख-साधनों की प्राप्ति होती है, दुःख व दुःख के कारणों का हटाया जाता है। सुख-शांति से जीने के लिये शारीरिक व मानसिक दोनों प्रकार के कर्म आवश्यक हैं। यदि कोई प्राणी कर्म न करना चाहे तो भी बिना कर्म के रह नहीं सकता। भूख-प्यास आदि दुःख व सुुःख का आवेग इतना कष्टदायक होता है कि व्यक्ति को कर्म करने ही होते हैं। कर्म करने में चूंकि कष्ट होता है, अतः हम कर्म से बचते हुए दुःख की निवृत्ति व सुख की प्राप्ति चााहने लगते हैं। तब हम अल्प श्रम वाले अधर्म का मार्ग पकड़ लेते हैं। इस से हम अधिक दुुुःखी हो जाते हैं, अस्वस्थ हो जाते हें।

प्रभु-कृपा से हममें से जो धर्म के मार्ग में आस्था-रुचि रखते हैं वे कर्म के कष्ट से बचना नहीं चाहते। उन्हें कर्म के कष्ट से बड़ा कष्ट कर्म के न करने में दिखता है। कर्म से ही दुःख की निवृत्ति ब सुख की प्राप्ति होती है, इस स्वयं के व अन्यों के अनुभव को देखकर हम शारीरिक व मानसिक कर्म करते हैं, हम अधिकाधिक शारीरिक-मानसिक कर्म करने की और बढ़ जाते हैं। प्रत्यक्ष दुःख की निवृत्ति व प्रत्यक्ष सुख की प्राप्ति आकर्षण बहुत बड़ा है, हमारी दृष्टि इसी पर टिकी रहती है, उससे हट कर देख पाना, दूर की सोच पाना प्राय नहीं हो पाता है।

प्रभु-कृपा से निद्रा का वरदान हमें मिलता है। कर्म करना आवश्यक है, पर उचित मात्रा में। कर्म करना आवश्यक है तो कर्म से विराम भी आवश्यक है। प्रभु के वरदान निद्रा का उचित उपयोग करते रहें तो हम पर्याप्त कर्म भी कर पाते हैं। यहि कर्म के आवेग में निद्रा का सेवन (कर्म विराम) न करें या कम करें तो प्रभु बलात् निद्रा दिला देते हैं। फिर भी हम उसका विरोध को, तो रोग के कारण विराम लेना ही पड़ता है। प्रश्न उठता है कि दुःख की निवृति व सुख की प्राप्ति की आशा से किये गये कर्म की परिणति दुःख की प्राप्ति व सुख की निवृति में कैसे हो गई ? कर्म से विराम न लेने के कारण।

प्रभु-कृपा से इस शारीरिक व कुछ मानसिक कर्म-विराम की प्राप्ति निद्रा से होने को हम स्वीकारते हैं व प्रायः पालते भी हैं या कहें यह स्वभावतः होता भी रहता है। किन्तु ऐसा जानते-मानते हुए भी हम जागते समय मन को विराम देने की कला न जानने से मानसिक रूप से अत्यधिक कर्म करते चले जाते हैं, विचारों के अनियंत्रित प्रवाह में बहत जाते हैं। जिस प्रकार थका शरीर अपना संतुलन व कर्यक्षमता खोता जाता हैै, उसी प्रकार विचारों के प्रवाह से थका मन भी अपना संतुलन व कार्यक्षमता खोता जाता है। परिणाम यह होता है कि हम छोटे-छोटे कारणों से उदृवेलित-आवेशित-अनियंत्रित हो जाते है। इससे स्वयं भी दुःखी होते हैं व अन्यों को भी दुःखी करके अपने लिये पाप कमा कर भविष्य में अपने घोर दुःख पाने की व्यवस्था कर लेते हैं ।

मन के कर्म अर्थात् विचारों का करना जीवन के लिये आवश्यक है। यह दुःख की निवृति सुख की प्राप्ति के लिये आवश्यक है। विचारों का कर्म -विराम प्रभु-कृप से निद्रा में हो भी जाता है, किन्तु जिस प्रकार अत्यधिक शारीकि कर्म करने पर निद्रा पूरी थकान को हटा नहीं पाती है, उसी प्रकार अत्यधिक व अनियन्त्रित विचार से उत्पन्न् मानसिक थकान को निद्रा पूरी तरह हटा नहीं पाती है।

प्रभु-कृपा से इसके लिये उपाय हैं। योग के द्वारा चित्तवृत्तियों को रोक देना। योग-समाधि-ध्यान के द्वारा विचारों को नियंत्रित्त करना, हमारे सुन्दर-सुखी-शांत जीवन के लिये आवश्यक है। एक ओर जहां इससे निद्रा के समान विश्राम-बल मिलता है, वहीं दूसरी ओर मन के नियन्त्रित होने से विचारों पर नियन्त्रण बना रहता है, फलतः मानसिक थकान अधिक नहीं होती। मन उद्वेलित-आवेशित-अनियन्त्रित नहीं होता। यम-नियम के पालन से हमारा मन विचारों के अनियन्त्रित प्रवाह में फंसने से बचा रहता है।

शरीरिक-कर्मविराम के महत्त्व को हम प्रायः समझते हैं, उसे कर भी पाते हैं। प्रभुकृपा से मानसिक-कर्मविराम के लाभ को भी अघिकांश जागरूक व्यक्ति समझते हैं, किन्तु उसे प्रायः कर नहीं पाते हैं। विचार करते रहने में पडे़ रहकर हम अपने को बहुत दुःख देते रहते हैं। प्रभु-कृपा से हमारे में यह सामथ्र्य है कि हम वैचारिक कर्म-विराम का अभ्यास करते हुए अपने को इस दुःख से बचा सकते हैं, इच्छित सुख-शांति पा सकते हैं।

 
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जिज्ञासा - जैसे प्रकाश की गति ३ लाख किमी/सेकिण्ड है वैसे मन की गति कितने कि.मी./सेकिण्ड है।

समाधान- मन स्वयं तो एक ही स्थान पर रहता है। मन सूक्ष्म-इन्द्रिय है, वह अपने गोलक स्थूल-इन्द्रिय मस्तिष्क में रहता है। ज्ञानेन्द्रियों सहित तन्त्रिका-तन्त्र (नाडिय़ों) के माध्यम से वह संपूर्ण शरीर में संकेत भेजकर कर्मेन्द्रियों में यथाशक्य क्रियायें करने में समर्थ होता है। यह संकेतों का प्राप्त करना व भेजना बहुत तीव्र गति से होता है। इसे सामान्य रूप से प्रकाश की गति के समान कह दिया जाता है, किन्तु इसकी गति प्रकाश की गति से कुछ न्यून होती है। 

मन में जब दूर देश का स्मरण/चित्र उभरता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि मन वहाँ पहुँच जाता है। वह तो विचार-ज्ञान-स्मृति मात्र से ऐसा होता है,मन तो शरीर में ही रहता है। जिस प्रकार मन भूतकाल व भविष्यकाल की घटना-वस्तु का स्मरण करते समय वास्तव में भूत-काल या भविष्यकाल में नहीं जाता, क्यों की भूत व भविष्य तो अभी हैं ही नहीं, भूतकाल जा चुका है,भविष्यकाल अभी आया नहीं है, पुनरपि हमें प्रतीति ऐसी होती है कि मन भूत-भविष्य में चला गया है। इसी प्रकार मन के दूर देश-वस्तु तक पहुँचने की भी हमें प्रतीति मात्र होती है, वास्तव में मन वहाँ जाता नहीं है। अत: मन में इस प्रकार की देशान्तर गति नहीं स्वीकारी जा सकती, फिर उसकी गति के मापन का प्रश्न ही नहीं रहता।

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हमारी मृत्यु का ईश्वर से क्या सम्बंद  है? क्या मृत्यु ईश्वर के द्वारा होती है और कब होती है? 

समाधान - जीवों को अपने पूर्व कर्मानुसार ईश्वर के द्वारा जाति (मनुष्य-गाय-वृक्ष आदि), आयु व भोग-साधन प्राप्त होते हैं। हमारे वर्तमान जीवन के कर्मों से हमारी आयु व हमारे भोग-साधनों की न्यूनाधिकता हो सकती है, होती है। अन्य प्राणियों व प्रकृति-पर्यावरण से भी हमारी आयु व हमारे भोग-साधनों की न्यूनाधिकता हो सकती है, होती है। आयु के साथ ही मृत्यु जुड़ी है। आयु की समाप्ति होने को ही दूसरे श􀀀दों में मृत्यु कहते हैं। जन्म के समय पूर्व कर्मानुसार आयु का निर्धारण ईश्वर के द्वारा किया जाने पर भी चूंकि हमारे वर्तमान के पुरुषार्थ या आलस्य के कारण आयु में न्यूनाधिकता हो सकती है, साथ ही प्रकृति व अन्य प्राणियों के कारण भी आयु में न्यूनाधिकता हो सकती है अत: यह तो नहीं माना जा सकता कि मृत्यु का क्षण, स्थान व प्रकार ईश्वर द्वारा निर्धारित व नियन्त्रित है। आत्महत्या, हत्या, दुर्घटना, रोग आदि की स्थितियों में मृत्यु का कारण निश्चय ही ईश्वर को नहीं माना जा सकता। अत: इस दृष्टि से हमारी मृत्यु का ईश्वर के साथ स􀀀बन्ध नहीं है, मृत्यु ईश्वर के द्वारा नहीं होती। ईश्वर को मृत्यु का परोक्ष कारण माना जा सकता है। पूर्व कर्मानुसार आयु
का निर्धारण ईश्वर करता है, वर्तमान जीवन के कर्मानुसार भी आयु की जो न्यूनाधिकता होती है वह ईश्वरीय व्यवस्था-नियमों के आधार पर होती है। इस रूप में ईश्वर परोक्ष रूप में हमारी मृत्यु से जुड़ा है। ईश्वर हमारी मृत्यु से एक अन्य दृष्टि से भी जुड़ा है। यह समझना चाहिये कि आत्महत्या, हत्या, दुर्घटना, रोगादि के द्वारा वस्तुत: मृत्यु नहीं होती। इनके  द्वारा तो मात्र शरीर को ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया जाता है कि वह आगे उपयोग के योग्य नहीं रह पाता, इनके द्वारा आत्मा को शरीर से निकाला नहीं जाता है। मृत्यु का अंतिम तात्पर्य यह है कि आत्मा वर्तमान शरीर को छोड़ देवे। आत्मा स्वयं शरीर को छोड़ नहीं सकती, न ही वहाँ से निकलकर अन्य शरीर में जा सकती है। आत्महत्या आदि के द्वारा जब शरीर आगे उपयोग के योग्य नहीं रहता, तब ईश्वर उस आत्मा को उस शरीर से हटा लेता है और आगे उसके कर्मानुसार नये शरीर को प्रदान करता है। इस दृष्टि से ईश्वर हमारी मृत्यु से जुड़ा है। समझने में प्राय: यह भूल होती है कि हम आत्महत्या, हत्या, दुर्घटना आदि को व उसके द्वारा शरीर के अयोग्य हो जाने को 􀀀ाी ईश्वर के द्वारा किया गया मान लेते हैं।
आत्महत्या, हत्या, दुर्घटना आदि के द्वारा जब असमय मृत्यु होती है तब आत्मा के भोगने से बचे कर्म व अन्य पुराने-नये कर्मों के अनुसार नया जन्म मिलता है। आत्महत्या के प्रसंग में साथ में दण्ड भी मिलता है। हत्या-दुर्घटना के प्रसंग में मरने वाले की क्षतिपूर्ति करके ईश्वर न्याय करता है

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