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कौनसी आत्माएँ वृक्षादि शरीर में आती है

जिज्ञासा ४९- मनुष्य-जीव (जीवात्मा) या पशु-जीव के स्थावर-योनि में जाने संबन्धी एक शंका मन में उत्पन्न होती है। पशु की आत्मा को तो स्थावर वृक्षादि योनि में जाना नहीं चाहिये, 􀀀योंकि वह तो भोग-योनि में है, पाप-पुण्य कर नहीं सकता। मनुष्यों की आत्माएँ ही अपने निकृष्ट कर्मों से वृक्षादि योनि में जाती होंगी। 

समाधान- यह ठीक है कि पशु-शरीर में मात्र भोग होते हैं, नये कर्म नहीं होते। यह बात वृक्षों (स्थावरों) के सन्दर्भ में भी उसी प्रकार लागू होती है, इनमें भी नये कर्म नहीं होते। इस दृष्टि से यदि आपके तर्क को व्यापक कर दिया जाये, तो कोई पशु अगला जन्म पशु का भी नहीं ले सकता, कोई स्थावर अगला जन्म स्थावर/ पशु का भी नहीं ले सकता। यदि यह तर्क माना जाये कि मात्र मनुष्य शरीर में ही नये कर्म होते हैं, अत: किसी भोग-योनि में जाने वाला आत्मा मनुष्य शरीर से ही जायेगा। ऐसे में यह भी मानना पड़ेगा कि एक भोग-योनि में जाकर प्रत्येक आत्मा पुन: मनुष्य शरीर में आता है। इस प्रकार अधिक पाप करने वालों के लिए क्रम बनेगा- एक बार मनुष्य शरीर व एक बार मनुष्येतर योनि, फिर एक बार मनुष्य शरीर व एक बार मनुष्येतर योनि, बस ऐसे ही चलता रहेगा। पृथ्वी पर मनुष्य व मनुष्येतर प्राणियों का अनुपात देखकर ऊपर वाला निर्णय स्वीकार नहीं हो सकता। यदि वैसा होता तो मनुष्य व मनुष्येतर प्राणियों का अनुपात-भेद इतना अधिक नहीं होता। स्पष्ट है कि मनुष्यों की सं􀀀या मनुष्येतर प्राणियों से करोड़ों-अरबों गुना कम है। इतने अधिक आत्मा मनुष्येतर शरीर में रहते हैं, यह उनके पाप-कर्मों का फल है, ये पाप-कर्म मात्र मनुष्य-शरीर में किये गये होते हैं। वस्तुत: आत्मा एक मनुष्य जीवन में ही इतने अधिक पाप कर लेता है कि उसका फल लाखों-करोड़ों-अरबों वर्षों तक लाखों-करोड़ों-अरबोंमनुष्येतर योनियों में भोगते चले जाना होता है। मनुष्य शरीर की समाप्ति पर जितने पूर्वजन्मों के बचे पाप-पुण्य कर्म होते हैं वे, और जितने इस मनुष्य जन्म में किये पाप-पुण्य बिना भोगे बचे रहते हैं, वे सब मिलकर यदि ५०-५० प्रतिशत हों, या पुण्य ५० प्रतिशत से अधिक हों और पाप ५० प्रतिशत से कम हों तो तत्काल अगला जन्म मनुष्य का मिल जाता है। किन्तु यदि पाप ५० प्रतिशत से अधिक हों और पुण्य ५० प्रतिशत से कम हों तो अगला जन्म मनुष्येतर योनि में होता है। पाप-पुण्य के इस अनुपात में पाप-पुण्य की सं􀀀या व उनकी गुरुता-लघुता (भारीपन हलकेपन) का समावेश समझना चाहिए। पाप की न्यूनाधिकता के अनुसार वह आत्मा एक-दो-दस-सौहजार- लाख-करोड़-अरब.... मनुष्येतर शरीर में पाप का फल भोगता चला जाता है। पशु से पशु, पक्षु से पक्षी, पक्षी से पशु, पशु-पक्षी से स्थावर वृक्षादि, वृक्षादि से पशु-पक्षी आदि इसी प्रकार जन्म लेता रहता है। पहले किस योनि में जायेगा-फिर किस में, यह पापकर्मानुसार ईश्वर ही निर्धारित करता है, वही इसे जानता है। एक शरीर (यथा सर्प) से अगला शरीर पुन: वही (सर्प) भी हो सकता है। इतर योनियों में यह पाप का भोग तब तक चलता रहता है, जब तक भोगते-भोगते पाप-कर्म घटते जाने से पुण्य के बराबर नहीं हो जाते। पापपुण् य ५०-५० प्रतिशत होते ही, उसे पुन: मनुष्य शरीर में नये कर्म करने का अवसर प्राप्त हो जाता है। कौन आत्मा कितने वर्षों तक कितनी मनुष्येतर योनियों में कितनी बार जन्म लेगा, यह उसके पाप-कर्मों की पुण्य से अधिकता पर निर्भर करता है। इस प्रकार पशु-योनि भोग-योनि होते हुए व उसमें नये पाप-पुण्य न किये जाने पर भी, पशु-योनि के बाद स्थावर-योनि (किसी भी मनुष्येतर योनि) में जन्म हो सकता है। (इस विषय में जिज्ञासा - ६९, पृष्ठ २४८ को भी देखें)

Comments

  • Priyanka 2 yrs ago

    आचार्य जी , मनुष्य जो इस जीवन में कर्म करता है

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