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क्या जीव ईश्वर में लय हो जाता है ?

जीव मोक्ष पाकर ब्रह्म में रहता है, ऐसा एक स्थान पर स्वामी जी ने लिखा है, (सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९, पृष्ठ २५॰, संस्करण ३८)। ब्रह्म का तात्पर्य हुआ परमेश्वर। यदि ऐसा हो तो पुनः जन्म का प्रश्न नहीं होना चाहिए। परन्तु एक स्थान पर यह भी लिखा है कि ब्रह्म में लय होना समुद्र में डूब मरना है। यह भी लिखा है कि ब्रह्म जीव, जीव ब्रह्म एक कभी नहीं होता। इन दोनों बातों में विराधाभास प्रतीत होता है।

सत्यार्थप्रकाश समुल्लास ९- ‘‘प्रश्न-मुक्ति में जीव का लय होता है, वा विद्यमान रहता है ? उत्तर- विद्यमान रहता है।

यहां महर्षि ने यह तो लिखा है कि जीव मुक्ति में ब्रह्म में रहता है, किन्तु साथ में यह भी लिखा है कि जीव स्वयं भी विद्यमान रहता है। महर्षि ब्रह्म व जीव की भिन्न-भिन्न सत्ता मानते हैं, ब्रह्म कभी जीव नहीं होता और जीव कभी ब्रह्म नहीं होता। 

जीव के ब्रह्म में रहने का यह अर्थ कथमपि नहीं है कि दोनों की पृथक्-पृथक् सत्ता नहीं रही, दोनों एक ही हो गये। अतः जीव के सर्वव्यापक होने की आशंका भी नहीं की जा सकती। मुक्ति से पुनः जन्म मानने में भी इससे कोई बाधा नहीं आती।

जीव के ईश्वरमय होने के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला- दोनों का पृथक् अस्तित्व न रहकर, एक ही अस्तित्व हो जाना, दूसरा- जीव का ईश्वर के ‘आनन्द’ गुण से युक्त हो जाना। यहां दूसरा अर्थ सिद्धान्ततः ठीक है। चूंकि ईश्वर आनन्दस्वरूप है, मुक्ति में जीव भी उसके आनन्द को पाकर आनन्दमय हो जाता है, अतः उसे इस दृष्टि से ईश्वरमय हो जाना कहा जा सकता है। अतः जीव-ब्रह्म की पृथक्ता का कथन इससे बाधित नहीं होता। जीव व ब्रह्म का अस्तित्व सदा पृथक् रहता है, दोनों में गुण-धर्मों की भिन्नता सदा रहती है। स्थान-देश की दृष्टि से जीव सदा ब्रह्म में ही रहता है। ब्रह्म के सर्वव्यापक होने से जीव कभी भी ब्रह्म से पृथक् स्थान पर नहीं जा सकता, नहीं मिल सकता।

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